कविता · Reading time: 1 minute

जीना नही है आसान

****जीना नही है आसान****
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अब जीना नही रहा है आसान,
लाशों से भरे पड़े हैं शमशान।

क्या हो गया खुदा के संसार को,
कोई भी रहा नहीं अब कद्रदान।

कब रुकेगा मौतों का काफिला,
कब लेगा कुदरत अपना संज्ञान।

कितनी जानों के हो गए हैं सौदे,
कितना ओर सहना हैं नुकसान।

बेवकूफियों की हदें पार देखकर,
सियाने भी बन चुके अब नादान।

मुल्क में रहा न कोई भी हितेषी,
काम न आ रहा दिया बलिदान।

मनसीरत देखकर है पागल हुआ,
गली और कूचे हो गए हैं सुनसान।
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सुखविंद्र सिंह मनसीरत
खेड़ी राओ वाली (कैथल)

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सुखविंद्र सिंह मनसीरत कार्यरत ःःअंग्रेजी प्रवक्ता, हरियाणा शिक्षा विभाग शैक्षिक योग्यता ःःःःM.A.English,B.Ed व्यवसाय ःःअध्ययन अध्यापन अध्यापक शौक ःःकविता लिखना,पढना भाषा ःःहिंदी अंग्रेजी पंजाबी हिन्दी साहित्यपीडिया साईट पर प्रथम रहना प्रतिलिपि…
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