#जीत की कुंजी

#जीत की कुंजी
// दिनेश एल० “जैहिंद”

नंदू पढ़ने-लिखने में एक कमजोर बालक था । वह अपनी इस कमजोरी से हमेशा चिंतित रहता था । वह कुछ अच्छा करना चाहता था, पर कर नहीं पाता था ।
और जब-जब परीक्षा की घड़ी नजदीक आती थी, वह तब-तब परीक्षा के डर से घबरा जाता था ।
अभी वह नौवीं कक्षा में था, उसकी छमाही की परीक्षा तीन महीने बाद होने वाली थी । चूँकि वह अपनी बौद्धिक क्षमता से परिचित था, सो वह बेहद डरा हुआ और परेशान था ।
वह सोच रहा था,– “ मेरी पढ़ाई बहुत कमजोर है । अभी से मेरी हालत खस्ता है । ठीक तीसरे साल मेरी मैट्रिक की परीक्षा होगी फिर तो फेल निश्चित है ।”
ऐसी ही चिंताओं से घिरा वह उलटा-सुलटा कुछ-न-कुछ सोचता रहता था । इसी बीच एक मित्र ने उसे सलाह दी कि वह विनय सर से मिले और उन्हें अपनी समस्याएं बताए । वे कुछ न-कुछ रास्ता निकाल देंगे ।
नंदू एक दिन हिम्मत कर सुबह-सुबह विनय सर से मिला, उन्होंने उसे कुछ बातें बतायीं और पढ़ाई में सुधार करने हेतु कुछ उपाय सुझाये ।
और फिर किसी विद्वान संत द्वारा लिखी एक किताब “सफलता की कुंजी” लाकर उसे दी और उसे ध्यान से पढ़ने को कहा ।
नंदू घर लाकर किताब पढ़नी शुरू की तो सप्ताह भर में ही उसे तीन बार पढ़ा और मूल मंत्र पाया कि लगन, मनन, चिंतन व सतत् प्रयत्न से मन का डर दूर भाग जाता है, काम में मन लगने लगता है और काम में सफलता सुनिश्चित हो जाती है ।
अब नंदू कुछ आश्वस्त हुआ और जुट गया छमाही परीक्षा की तैयारी में । तरह-तरह के सम्भावित प्रश्नों को तलाशता और उत्तर पुस्तिका का सहारा लेकर आने वाली परीक्षा की तैयारी करता । धीरे-धीरे उसका आत्मविश्वास बढ़ने लगा और मन में संतुष्टि आने लगी ।
आज वह नौवीं की स्कूली परीक्षा हॉल में बैठा है, पर भयभीत नहीं है, प्रसन्न है । प्रश्न पत्र हल करने के लिए बेचैन है ।

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दिनेश एल० “जैहिंद”
09. 04. 2018

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