कविता · Reading time: 1 minute

जिसके जान से ही मेरी पहचान है ।

जिसके जान से ही मेरी पहिचान है,
तुम नही तो दिन मेरा सूनसान है।
नजरे है कटीली दिलपर आ लगी,
आंखे तो उसकी पूरी धनुष का बान है।
आने लगी हवा के झोके से पास मे,
सब जानते है वो मेरी दिल ओ जान है।
आवाज दे रहा हूं करीब आओ तुम,
वो तो मेरी सुबह की पहली अजान है।
छेड़ दोगे मेरे तंत्री को जब कभी,
निकले जो स्वन वो सुंदर सी गान है ।
विन्ध्य प्रकाश मिश्र विप्र

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विन्ध्यप्रकाश मिश्र विप्र काव्य में रुचि होने के कारण मैं कविताएँ लिखता हूँ । मै मौलिक विचारों के बिम्ब को लिपिबद्ध करता हूँ । स्वान्तःसुखाय लिखता हूँ । किसी प्रसिद्धि…
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