गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

जिनको ईमान

जिनको ईमान सरे आम लुटाते देखा .
क़द ज़माने में उन्हीं को ही बढ़ाते देखा ..

पारसाई की मिसालें थीं जहां में जिसकी . ( = पवित्रता )
गोरे आरिज़ पे उसे जान लुटाते देखा .. ( = गाल )

जिनके नक़्शों को कभी चूम लिया था मैंने .
शर्म आती है उन्हें राह जो जाते देखा ..

हम तो आये थे किनारों पे बड़ी हसरत से .
प्यास नदियों को भी आँखों में छिपाते देखा ..

जिनकी खुशरंग मिज़ाजी के बड़े चर्चे थे .
ख़ाक सहराओं की उनको भी उड़ाते देखा ..

नाम आया था तेरा यूँ ही मेरे होंठों पर .
अपने लफ़्ज़ों को भी ख़ुशबू सी लुटाते देखा ..

मर ही जाता जो कोई और बिताता ऐसी .
हमने ख़ुद को जो “नज़र” उम्र बिताते देखा ..

(नज़र द्विवेदी)

1 Like · 2 Comments · 35 Views
Like
12 Posts · 463 Views
You may also like:
Loading...