मुक्तक · Reading time: 1 minute

जिधर देखिये बस उधर खा रहे हैं

इधर खा रहे हैं उधर खा रहें हैं।
मायापति अचम्भित किधर जा रहे हैं।
न पूछो तमन्ना चखूल्लड़ की अबतो,
जिधर देखिए बस उधर खा रहे हैं।
मदिरा और बकरा के नीचे न माने।
जो दे खिला बस उसी को हैं जाने।
घर वाले टोके तो लगता बेमानी
कह के निकलते सुधर जा रहे हैं।
न पूछो तमन्ना चखूल्लड़ की अबतो,
जिधर देखिए बस उधर खा रहें हैं।
रुपया गिरेगा बारिश के माफिक।
सम्भले हुए हैं जो हैं इनसे वाकिफ।
खाने पे आएं तो खा जाएं सबकुछ
जो खरच गए सबकुछ वो घर जा रहें हैं।
न पूछो तमन्ना चखूल्लड़ की अबतो,
जिधर देखिए बस उधर खा रहे हैं।
-सिद्धार्थ पांडेय

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