मुक्तक · Reading time: 1 minute

जिंदगी

रूबरू ज़िंदगी ,घूमती रही ।
रूह की तिश्नगी, ढूँढती रही ।
रहा सफ़र दर्या का, दर्या तक,
मौज साहिल को ,चूमती रही ।
…. विवेक दुबे”निश्चल”@…

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मैं - विवेक दुबे "निश्चल" पिता-श्री बद्री प्रसाद दुबे"नेहदूत" माता- स्व.श्रीमती मनोरमा देवी शिक्षा - स्नातकोत्तर पेशा - दवा व्यवसाय मोबाइल-- 07694060144 कवि पिता श्री बद्री प्रसाद दुबे "नेहदूत" से…
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