जिंदगी

ज़िन्दगी को यू ही बेकार मत बनाइए ,
अपने ग़म को औरों को मत सुनाइए ।

है यहाँ सब अपने मतलब के ही यार
आप भी अब थोड़ा मतलबी बन जाइए ।

आँखों में चुभ रहे है किसी के आजकल
ऐसा है तो हमसे नजर नही मिलाइए ।

इन भागदौड़ में थक गए होंगे शायद
मेरे ही घर आकर थोड़ा ठहर जाइए।

मुझे समझ सके तो समझ ले जल्दी
इस तरह ये आईना नही दिखाइए ।

मारने के और तरीक़े आते नही क्या
इस तरह ज़हर हाथों से मत पिलाइये ।

इश्क़ में मशगूल है हम अभी थोड़ा
नींदों से अभी हमें मत जगाइए।

हम पुराने हो गए है अब या पसंद नही ,
ऐसा कीजिये बाज़ार से नया खरीद लाइए।

पाग़ल, दीवाना ,आशिक ये क्या है
हम ‘हसीब’ है हमें वही बुलाइए ।

-हसीब अनवर

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