कविता · Reading time: 1 minute

जिंदगी

जिंदगी जीना सीख ले मानव
भेद धर्म-सम्प्रदाय छोड़ जी ले
नहीं मिलेगा ये जीवन फिर
छोड़ बैरभाव जी ले पी ले अमृत-रस
जीवन है ये थोड़ा मानव
कुछ निमिषों का ओर है मानव
परस्पर प्रेम से रहना सीख
धर्म बना ले मानवता
हिलमिल प्रेम से रहना सीख
क्यों बंट कर शक्ति गंवाते
क्या याद नहीं तुमको
डाल फूट राज किया किसने
भूले ग़ुलामी दो सदी की
भूलों ना इतिहास अभी
प्रेम से रहना सीख ले मानव
जिंदगी जीना सीख ले मानव ।।
मधुप बैरागी

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