· Reading time: 1 minute

जिंदगी रेत जैसे फिसलती गयी

प्यास जीने की ज्यों-ज्यों मचलती गयी।
जिंदगी रेत जैसे फिसलती गयी।
ख्वाब पूरे नहीं हो सके उम्र भर-
देह बचपन जवानी में ढ़लती गयी।

#सन्तोष_कुमार_विश्वकर्मा_सूर्य

3 Likes · 201 Views
Like
You may also like:
Loading...