जिंदगी के उस मोड़ पर

कवि:- शिवदत्त श्रोत्रिय

जिंदगी के उस मोड़ पर(यह कविता एक प्रेमी और प्रेमिका के विचारो की अभिव्यक्ति करती है जो आज एक दूसरे से बुढ़ापे मे मिलते है ३० साल के लंबे अरसे बाद)

जिंदगी के उस मोड़ पर आकर मिली हो तुम
की अब मिल भी जाओ तो मिलने का गम होगा|

माना मेरा जीवन एक प्यार का सागर
कितना भी निकालो कहा इससे कुछ कम होगा||

चाँदनी सी जो अब उगने लगी है बालो मे
माना ये उम्र तुम पर अब और भी अच्छी लगती है|

अब जो तोड़ा सा तुतलाने लगी हो बोलने मे
छोटे बच्चे सी ज़ुबान कितनी सच्ची लगती है|

सलवटें जो अब पढ़ने लगी है गालो पर तुम्हारे
लगता है कि जैसे रास्ता बदला है किसी नदी ने ||

जो हर कदम पर रुक-२ कर सभलने लगी हो
सोचती तो होगी कि सभालने आ जाऊं कही मे |

तुम्हारी नज़र भी अब कुछ कमजोर हो गयी है
जैसे कि मेरा प्यार तुम्हे दिखा ही नही |

मिलने की चाह थी मुझे जो अब तक चला हूँ
विपदाए लाखो आई पर देखो रुका ही नही ||

पर फिर भी ……

जिंदगी के उस मोड़ पर आकर मिली हो तुम
की अब मिल भी जाओ तो मिलने का गम होगा|

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