जिंदगी की रेस

दूर तक बस केवल एक सन्नाटा नज़र आता है,
सन्नाटे में आदमी को सिर्फ भागते हुए पाता हूँ I

जिंदगी को रेस बनाकर हम कहाँ दौड़ते जा रहे ?
कहाँ जाना ?क्या पाना ? हम नहीं समझ पा रहे,
अंधी दौड़ प्रतियोगिता में बस भागते हुए जा रहे ,
इंसानियत से दूर आग के दरिया में समाते जा रहे I

दूर तक बस केवल एक सन्नाटा नज़र आता है,
सन्नाटे में आदमी को सिर्फ भागते हुए पाता हूँ I

“राज” एक दिन तुझे भी इस “ जहाँ ” को छोड़कर है जाना,
प्यारी जिंदगी को “दुनिया की रेस” बनाकर दौड़ मत लगाना,
मुट्ठी बांधकर आया था दुनिया में, हाथ फैलाकर तुझे है जाना ,
“ इंसानियत का दामन” थाम ले,तुझे “प्रभु” की नगरी है जाना I

दूर तक बस केवल एक सन्नाटा नज़र आता है,
सन्नाटे में आदमी को सिर्फ भागते हुए पाता हूँ I

देशराज “राज”

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