.
Skip to content

जिंदगी की चार दिशाएँ

लोधी डॉ. आशा 'अदिति'

लोधी डॉ. आशा 'अदिति'

कविता

February 2, 2017

मेरे दोनों हाथ, दोनों पैर
बँट गए हैं चारों दिशाओं में
और मेरा शरीर लटक रहा है
त्रिशंकु की तरह
बीच अधर में

मुझे हर एक दिशा जान से प्यारी है
मेरे शरीर से भी ज्यादा

निर्णय नही ले पा रही हूँ मैं
चुन लूँ कौन सी दिशा
क्योंकि एक दिशा चुनने पर
जुडी रह पाऊँगी मैं
सिर्फ और सिर्फ दो ही दिशाओं से

पर मुझे तो
चारों ही दिशाएं
समान रूप से प्यारे हैं
और जुड़ीं रहना चाहती हूँ मैं
एक साथ इन सभी से

भले ही
इसके लिए मुझे
लटकना पड़े
त्रिशंकु की तरह
ताउम्र
यूँ ही

# लोधी डॉ. आशा ‘अदिति’ (भोपाल)

Author
लोधी डॉ. आशा 'अदिति'
मध्यप्रदेश में सहायक संचालक...आई आई टी रुड़की से पी एच डी...अपने आसपास जो देखती हूँ, जो महसूस करती हूँ उसे कलम के द्वारा अभिव्यक्त करने की कोशिश करती हूँ...पूर्व में 'अदिति कैलाश' उपनाम से भी विचारों की अभिव्यक्ति....
Recommended Posts
मैं चाहता हूँ...(विवेक बिजनोरी)
"मेरे ख़्वाब में फ़िर यूँ आने से पहले, मुझे इस तरहा फ़िर सताने से पहले। मैं चाहता हूँ तुम भी मेरे साथ जागो यूँ रातों... Read more
"अब तो मैं.... डरता हूँ" (शेर) 1. मैं कहाँ अदावत से डरता हूँ मैं तो बस ज़िलालत से डरता हूँ इतना लूटा गया हैं मुझे... Read more
मेरे साँवरे तुम
मैं टूटा हुआ हूँ, मैं बिखरा हुआ हूँ, मुझे अब संभालो, मेरे साँवरे तुम. भंवर मे मैं देखो, धसा जा रहा हूँ, यहाँ से निकालो,... Read more
मैं बेटी हूँ
???? मैं बेटी हूँ..... मैं गुड़िया मिट्टी की हूँ। खामोश सदा मैं रहती हूँ। मैं बेटी हूँ..... मैं धरती माँ की बेटी हूँ। निःश्वास साँस... Read more