गज़ल/गीतिका · Reading time: 2 minutes

जिंदगी का बोझ

वो न जाने कैसे अपने गुनाहों का बोझ लिए फिरते है ,
उन्हें इनका वजन महसूस नहीं होता,बेफिक्र रहते है ।

हमसे तो अपने दर्द ओ गम का बोझ सहा नही जाता,
अपनी जिंदगी को भी बोझ की तरह ढोए फिरते है ।

यूं तो हर इंसा जहां में अपना अपना बोझ ढो रहें है ,
कौन ऐसे है यहां जो बिना बोझ लिए जी सकते है ?

दिल के बोझ को रूह पर काबिज हुए देर नही लगती ,
जज्बात में आकर कुछ लोग जिंदगी हार बैठते है ।

क्योंकि इंसान की फितरत है खुशी तो बांट सकते है ,
मगर अपने गुनाह और दर्द दिल में छुपा कर रखते है।

मालूम है ना!कोई इनका खरीदार नहीं बनना चाहेगा,
फूल सबको अच्छे लगते है कांटे किसको भाते हैं?

कांटे तो खुदा के दर पर भी नजर नहीं किए जाते है ,
क्योंकि खुदा को भी तो फूल ही अच्छे लगते हैं ।

अब जो भी है अपने ही किए गए कर्मो का नतीजा है ,
दुख सुख ,दर्द ओ गम का बोझ हमें ही उठाने होते है ।

इंसा को अपने कर्म नजर नहीं आते नतीजा दिखता है,
फिर गुनाह क्यों बोझ लगेंगे,तभी वो लुत्फ उठाते है ।

हमने तो नही किया कोई गुनाह ,कुछ खताएं ही की हैं,
फिर भला हम क्यों और किस गुनाह की सजा पाते हैं?

हमने नासमझी में अपनी जिंदगी के साथ जुआ खेला,
कुछ तकदीर ने धोखा दिया जिसका जुल्म सहते है ।

अब जो भी अंजाम होना था हो गया जिन्दगी के साथ,
चलो “अनु”दर्द ओ गम ऐ लुत्फ अब हम भी उठाते है ।

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