कविता · Reading time: 1 minute

जिंदगी अब और इम्तिहाँ न ले

“बस कर ऐ जिंदगी अब और इम्तिहाँ न ले ,
इस पार हूँ या उस पार अब बता ही दे .
कहते हैं तू हर मोड़ पे सबक सिखाती है ,
पर उस मोड़ का मुकाम तो बता ही दे
मंजिले तो तू बहुतों को देती है ,
पर मंजिल तक जाने का राह तो दिखा ही दे
थक गया है दिल खुद को बेक़सूर साबित करके ,
पर अब तू तो मुझे गुनहगार साबित न कर
रंग तो ज़माने के देखे हैं बदलते मैंने पर
जिंदगी तू तो मुझसे यु बेरुखी न कर ,
बेरुखी ही करनी है तो वो भी सही ,और तड़पा न मुझे ,
या तो इस पार कर दे या उस पार कर दे .”

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