मुक्तक · Reading time: 1 minute

मुकरियां

मुकरियां
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यौवन की शोभा बढ़ जाती
हर नारी इस पर इतराती
करती उससे असीमित प्यार
ऐ सखि साजन, नहीं सखि हार

देख देख उसको जीती हूं
मैं जाम खुशी के पीती हूं
सदा मेरे पास वह लेटा
ऐ सखि साजन, नहिं सखि बेटा

बारिश में है साथ निभाया
धूप में बन गया वह साया
हरदम मेरा साथ निभाता
ऐ सखि साजन, नहिं सखि छाता

हरदम मेरा साथ निभाए
यात्रा को यह सरल बनाए
पहुंचाए समय से ड्यूटी
ऐ सखि साजन, नहिं स्कूटी

अपने भीतर मुझे बिठाकर
दूर-दूर तक सैर करा कर
थककर भी नहीं माने हार
ऐ सखि साजन, नहीं सखि कार

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