जाने ये मन क्यों अकेला है

चारों ओर खुशियां ही खुशियां हैं
फिर भी ये मन क्यों अकेला है
निभाये जा रहा है रिश्ते हरदम
चले जा रहा है ये निश्चल मन
ईश्वर ने जिस राह पर धकेला है

टूट गया है भीतर से बहुत
ज़िंदगी भी थकने सी लगी है
चली जा रही बस यों ही पगली सी
है लोगों का शोर बहुत और भीड़ बहुत
जाने फ़िर भी ये मन क्यों अकेला है

है कहने को बहुत कुछ..मन भी है उतावला बहुत
चंचल मन ये जाने क्यों भागे चला जा रहा है
भीड़ में अपनों को खोजे चला जा रहा है
मुस्कान में अश्रु छिपाये चले जा रहा है
है अपने भी बहुत..प्रेम मिला भी बहुत
जाने फ़िर भी ये मन क्यों अकेला है

है ज़िम्मेदारियों का बोझ बहुत
कर्तव्यो को मन निभाये चले जा रहा है
है बोझिल मन इच्छाओं के बोझ तले
बस यों ही चुप्पी साधे चले जा रहा है
है ईश्वर की कृपा बहुत और दया बहुत
जाने फ़िर भी ये मन क्यों अकेला है

नहीं है शिकायत कोई अब ज़िंदगी से
दम फिर भी जाने क्यों घुटता चला जा रहा है
दिया ईश्वर ने जो मन स्वीकारे चला जा रहा है
पुकारा बहुत अपनों को कि अकेला है मन
हर कोई पीछा छुडाये चला जा रहा है
मन समझाये है खुद को बहुत
कोई नहीं है बुरा इस जग में
कहे समझ ले तू बस यही जीवन खेला है
जाने फिर भी ये मन क्यों अकेला है

है ईश्वर पर भरोसा बहुत..अपने पर विश्वास बहुत
बन अपनी खुद की ही ताकत
उठ खड़ा हो तुझे नहीं है किसी की ज़रूरत
बना अपनी सोच को ही इतनी बुलंद
चल अकेला भवसागर के उस पार
क्यों कश्ती की बाट यों जोहे चले जा रहा है
अकेले ही आये हो अकेले ही जाओगे
मन ये खुद को समझाये चला जा रहा है
अक्सर चिन्तन किये जा रहा है
यूं ही बस चुप्पी साधे चला जा रहा है
मन बांवरा बस सोचे चला जा रहा है.

©® अनुजा कौशिक

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