Skip to content

जागो

Ranjana Mathur

Ranjana Mathur

कविता

September 9, 2017

जागो
जंगलात को काट काट हम बना रहे हैं शहर,
प्रकृति का प्रकोप कभी बन कर गिरेगा कहर।
कुदरत और प्राणी दोनों हैं इक दूजे के पूरक,
न समझा मानव अभी तो आगे पछताएगा मूरख।।

——–रंजना माथुर दिनांक 09/07/2017
मेरी स्व रचित व मौलिक रचना
©

Author
Ranjana Mathur
भारत संचार निगम लिमिटेड से रिटायर्ड ओ एस। वर्तमान में अजमेर में निवास। प्रारंभ से ही सर्व प्रिय शौक - लेखन कार्य। पूर्व में "नई दुनिया" एवं "राजस्थान पत्रिका "समाचार-पत्रों व " सरिता" में रचनाएँ प्रकाशित। जयपुर के पाक्षिक पत्र... Read more
Recommended Posts
जागो मेरे हिंदुस्तान ! बहुत हो चुका है अपमान( गीत)पोस्ट २८
Jitendra Anand गीत Oct 16, 2016
जागो मेरे हिंदुस्तान ! बहुत हो चुका है अपमान ****************************गीत********** तुम सोये तो भाग्य सो गया ,बहुत हो चुका है अपमान। यह सोने क् समय... Read more
जागो मतदाता जागो
?जागो मतदाता जागो? देश का कल रहा पुकार है मतदान तेरा अधिकार श्रमिक,बणिक सुनो नर औ'नार वक्त की है यह दरकार जो मत देते नहीं... Read more
उठो उठो मेरे जागो बेटा
उठो उठो मेरे जागो बैटा मेेैया बुलाया करती है| हुआ सबेरा मुर्गा वोला,चिडियाँ कू-कू करती है|| सूरज की किरणे भी यारो बिखरा बिखरा करती है|... Read more
कुण्डलिया छंद
जागो प्रियवर जागो प्रियवर मीत रे ,कहे सुनहरी भोर. चलना है गर आपको , सुखद लक्ष्य की ओर. सुखद लक्ष्य की ओर ,बढेगें अगर नही... Read more