Jan 10, 2017 · कविता
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जागो कहाँ गुम हो बेटी

बहुधा लिखी गयी ‘बेटी’
लेकिन अवर्णित है ‘बेटी’
फिर से कलम की नोक पे है
काँटों की नोक पे जो बेटी

नभ छूकर आयी है ‘बेटी’
पर्वत चढ़ आयी है’बेटी’
सागर भी जिसने नापा है
वह करिश्माई है ‘बेटी’

देवी सम पूजी जाती जो
देश का मान बढ़ाती जो
चौखट अन्दर या बाहर हो
कर्मों से द्वार सजाती जो

एका नहीं पर इसमें है
वरना दम और किसमें है
ये जग सताये जो बेटी
पग रोंधी जाये जो बेटी

यह शायद अटपटा लगे
कुछ दिल को खटखटा लगे
कड़वा है पर एक सच भी
बेटी की दुश्मन है बेटी

बन बहु सताये वो बेटी
बन सास जलाये वो बेटी
भावज रूलाये वो बेटी
जो ननद सताये वो बेटी

जो मारी जाये वो बेटी
जो गला दबाये वो बेटी
जो है उकसाये वो बेटी
जो चुप रह जाये वो बेटी

जो दुष्ट जनाये वो बेटी
उसे न समझाये वो बेटी
रिश्ते उलझाये वो बेटी
जो सब सह जाये वो बेटी

आवाज उठाये न बेटी
मिलजुल कर आये न बेटी
जिस दिन भी जागेगी बेटी
ये धरा हिला देगी बेटी

तुम भी बेटी,मैं भी बेटी
आओ मिलकर हम सब बेटी
एक बुलन्द आवाज बनें
सिर्फ पंख नहीं परवाज़ बनें

सुनो एक हो जाओ तुम
दुष्टों को धूल चटाओ तुम
जब ऐसा वक्त आ जायेगा
फिर देखो कौन सतायेगा

सो रोना-धोना बंद करो
स्वहित का खुद प्रबंध करो
दिखादो कि तुम हो बेटी
जागो कहाँ गुम हो बेटी

हेमा तिवारी भट्ट

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लिखना,पढ़ना और पढ़ाना अच्छा लगता है, खुद से खुद का ही बतियाना अच्छा लगता है,... View full profile
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