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ज़िद ये ज़िद्दी है

Yatish kumar

Yatish kumar

मुक्तक

October 28, 2017

ज़िद ये ज़िद्दी है

गेसुओं को अश्क़ में डुबाने की ज़िद है
टेसुओं(आँसुओं) को कोर पे ठहराने की ज़िद है
कटाक्ष पे कहकहे लगाने की ज़िद है
तेरे ख़ातिर दुनिया से लड़ जाने की ज़िद है

तू जब भी रूठे तो मनाने की ज़िद है
तू जब भी रो दे तो हंसाने की ज़िद है
तेरे सारे नाज़ नख़रे उठाने की ज़िद है
तुझे धज अपने हाथों बनाने की ज़िद है

तेरे ख़्वाब में रोज़ आने की ज़िद है
उन्ही ख़्वाबों को फिर सजाने की ज़िद है
तेरी ज़ुल्फ़ में उलझ जाने की ज़िद है
तेरी ज़िंदगी को सुलझाने की ज़िद है

तेरे लम्स को रूह में बसाने की ज़िद है
तेरी ख़ुशबू में गुम हो जाने की ज़िद है
बिना कहे हर बात समझाने की ज़िद है
अब तेरा बस तेरा हो जाने की ज़िद है

तेरी आँखों में उतर जाने की ज़िद है
तेरी साँसों में फिर घुल जाने की ज़िद है
धड़कनों से धड़कन मिलाने की ज़िद है
तेरे अक्स में यतीश दिख जाने की ज़िद है

यतीश २७/१०/२०१७

Author
Yatish kumar
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