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“ज़िंदगी” कहानी

Dr.rajni Agrawal

Dr.rajni Agrawal

कहानी

July 14, 2017

*ज़िंदगी*
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धूप की तरह खिलखिलाती राहत की ज़िंदगी में इस तरह अँधेरी रात ग्रहण बन कर आएगी ये उसने तब जाना जब अस्पताल में ज़िंदगी और मौत के बीच झूझती, स्ट्रैचर पर जाती अपनी माँ को देखा । मन में अनगिनत विचारों की उथल-पुथल में घिरी वह खिड़की की तरफ मुँह किए अपने आँसू पीकर कभी न बुझने वाली प्यास को तृप्त करने में लगी थी। आज अकेलेपन का भयावही अहसास उसे निगलता सा नज़र आ रहा था। मैं अपलक उसकी टूटती हुई उम्मीदों को देख रही थी।पास जाकर मैंने ज्योंहि उसके कंधे पर हाथ रखा वो चौंक कर मुड़ी और मुझसे लिपट कर फफक फफक कर रोने लगी। अपनों की जुदाई का अहसास क्या होता है ये उसी अस्पताल में मैंने एक दिन पहले कौमा में गए अपने पिता को देख कर जाना था। बहन से लिपटी बार-बार मैं यही कह रही थी -“जीजी, हम अनाथ हो गए।” जीजी सच्चाई का कड़वा घूँट पीती हुई मेरे सिर पर हाथ फेरकर कर कह रही थीं – ऐसा क्यों कहती है पगली?? हम सब हैं ना..एक -दूसरे का सहारा। कुछ नहीं होगा पापा को।” आज उसी दौर से गुजरती राहत को गले से लगाए आपबीती याद करके मेरी आँखों से आँसू बह निकले। थरमस से जूस निकाल कर राहत को देते हुए मैंने उसे अपने पास बैठाया ही था कि दर्द भरी चींखों और रुदन के स्वर कान को भेदते हुए सुनाई पड़े । दस साल के मासूम अजय को ईश्वर ने सदा के लिए चिर निद्रा में सुला दिया था। कैसा है नियति का खेल ? जिस अजय के जन्म लेने पर ढोल- नगाड़े बजे थे , जिन बाँहों ने उसे झूला झुलाया था आज वही बाँहें उसकी लाश लिए खड़ी थीं। ज़िंदगी की वास्तविकता से अस्पताल में यूँ मुलाकात होगी, कभी सोचा न था। वेदना के इस साम्राज्य में हम अजनबी एक-दूसरे को गले से लगा कर ,आँसू पोंछते हुए ईश्वर से सबकी सलामती की दुआ माँग रहे थे।देखते -देखते आँखों में रात गुज़र गई ।सूर्य की स्वर्णिम आभा फिर नई सुबह लिए लालिमा छटकाती उम्मीद की किरण बनकर आई । एकाएक कानों में मिश्री घोलते मिसेज बनर्जी के सुमधुर स्वर सुनाई पड़े… ज़िंदगी प्यार का गीत है इसे हर दिल को गाना पड़ेगा ,ज़िंदगी ग़म का सागर भी है हँस के उस पार जाना पड़ेगा….। थाली में संदेश लिए बड़े प्यार से एक-एक के मुँह में खिलाती और सिर पर हाथ फेरती मिसेज बनर्जी ने हम सबके चेहरे पर मृदु मुस्कान भरते हुए उनके साथ ये गीत गाने का आग्रह किया। हम सब गीत गाते हुए अपने ग़मों को भूल कर मुस्कुराने लगे। ऑपरेशन थियेटर की हरी बत्ती देखकर मायूसी का आलम खुशियों में बदल गया। राहत माँ को स्ट्रैचर पर बाहर आते देख कर फूली नहीं समा रही थी।

डॉ. रजनी अग्रवाल “वाग्देवी रत्ना”
संपादिका-साहित्य धरोहर
महमूरगंज, वाराणसी (मो.-9839664017)

Author
Dr.rajni Agrawal
 अध्यापन कार्यरत, आकाशवाणी व दूरदर्शन की अप्रूव्ड स्क्रिप्ट राइटर , निर्देशिका, अभिनेत्री,कवयित्री, संपादिका समाज -सेविका। उपलब्धियाँ- राज्य स्तर पर ओम शिव पुरी द्वारा सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार, काव्य- मंच पर "ज्ञान भास्कार" सम्मान, "काव्य -रत्न" सम्मान", "काव्य मार्तंड" सम्मान, "पंच रत्न"... Read more
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