जहर

जहर भरा है सर्प से
भी ज्यादा
इन्सान में

अपना बन कर काटता है
आस्तीन में ही छिपा रहता है
इन्सान की

भाई, भाई के लिए
उगलता है ज़हर
फिर डसता अपनो को ही

परिवार में जहरीली
नौकझौक से
दिल हो जाता है तार तार
हर कोई जहर खिलाता
रहता है बार बार

हाँ ! जहर तो मारता है
एक बार
रिश्तों के जहर मारते है
बार बार

जहर !
बदनाम हो कर भी
है वफादार
इन्सान वफादारी का ढोंग
करते हुए भी
है बदनाम

मत बनाओ जहर
जिंदगी ऐ दोस्त
हँसी खुशी से काटो
जिंदगी ऐ दोस्त
भरोसा नहीं
इस जिंदगी का
फिर क्यो
इकट्ठा करते हो
जहर ऐ इन्सान

स्वलिखित लेखक संतोष श्रीवास्तव
भोपाल

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