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जहर खिलाए आदमी तरकारी के नाम (दोहे)

करता जाता आदमी, ऐसे भी कुछ काम !
ज़हर खिलाता बेझिझक, तरकारी के नाम !!
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इंजेक्शन से सब्जियां, पकती आज तमाम !
सरे आम बाजार में, बिकती ऊँचे दाम !!
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पड़े नहीं जब खेत में,.. गोबर वाला खाद !
कैसे दें फिर सब्जियां, वही पुराना स्वाद !!
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जहर हो रही सब्जियाँ, ..जनता है लाचार !
तंत्र निकम्मा हो गया,पनपा छल व्यापार !!
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ऐसी हालत देख कर, शासन भी है मौन !
रही लेखनी चुप अगर, तो पूछेगा कौन !!
रमेश शर्मा

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