जल है तो कल है

विश्व जल दिवस पर आग के साथ कविता

आप सब ने सुना होगा कहते हैं जल है तो जीवन है और अब जल संकट सबके सामने खड़ा है हमें ये समझ लेना चाहिए कि जल नहीं जीवन संकट के सामने खड़ा है।वैसे तो पृथ्वी पर71%जल होना मानव के लिए वरदान से कम नहीं।पर विडम्बना तो देखिए वरदान युक्त प्राणी भी कितने विकट संकट से घिरा है।कारण अनेक उपस्थित हैं लेकिन निवारण में एक भी कदम आगे नहीं आता है।नदियाँ लुप्त होती जा रही हैं।तालाब, झील, पोखर सूखते जा रहे हैं।नल और कुएँ का जल स्तर गिरता जा रहा है।मैं ये सोच रहा हूँ कि जल का स्तर गिर गया है कि मानव का।
सवाल बहुत आम है और समस्या उतनी ही जटिल।हम जल बना नहीं पा रहे हैं पर इससे बड़ा दुःख की हम इसे बचा भी नहीं पा रहे हैं।जल का संरक्षण करना हमें आता नहीं।जल आसानी से उपलब्ध हो जायेगा दिल से ये भरम जाता नहीं।
सम्पूर्ण मानव जाति खतरे के निशान से ऊपर बह रही है।लेकिन आपदा प्रबंधन अभी भी मुंगेरी लाल के सपनों में खोया है।नदियों के तट का अतिक्रमण बाढ़ जैसी स्थिति उत्पन्न करने में अहम भूमिका निभा रहा है और हम कहते हैं भगवान को क्रोध आ रहा है।प्रकृति अनियंत्रित है।हम अपने अनियंत्रित व्यवहार के लिए घृतराष्ट्र हैं और दूसरों की गलती पर गिद्ध दृष्टि लगाये हुए हैं।
मेरा लिखना कहाँ तक सार्थक होगा अब ये आप बतायेंगे
सबसे पहले जल बचाने का संकल्प निभायेंगे
वर्षा के जल को भूमिगत करायेंगे
और शेष को एकत्र करके बचायेंगे
जल है तो कल है
जल है तो थल है
जल है तो कहाँ मरुस्थल है
जल है तो बल है
आइए पहल करें और प्रतिपल अग्रसर हों जल संरक्षण की ओर।
इसी श्रृंखला में मेरी एक कविता सामान्य भावों से विशेष भावनाओं को अभिव्यक्त करती हुई।
जल है तो जीवन है
जल है तो जीने का साधन है
जल है तो बहुमूल्य संसाधन है
जल है तो मानव की धड़कन है
जल है तो इस ग्रह पर श्वसन है
जल है तो शरीर में अवचेतन है
जल है तो गंगा पावन है
जल है तो नदियाँ करती किर्तन है
जल है तो जलाभिषेक पूजन है
जल है तो समस्त पापों का विसर्जन है
जल है तो माँ की ममता का अपनापन है
जल है तो पितृ, श्राद्ध और तर्पन है
जल है तो यहाँ हरित उपवन है
जल है तो धरती मनभावन है
जल है तो हर मौसम में नयापन है
जल है तो बूदों का सावन है
जल है तो नवीन बीजों का सृजन है
जल है तो चिड़ियों का गुंजन है
जल है तो समुद्र मंथन है
जल है तो सुगंधित सुमन है
जल है तो भव्य आयोजन है
जल है तो यहाँ रहन-सहन है
जल है तो प्रकृति का मनोरम दर्शन है
जल है तो मनुष्य के लिए भोजन है
जल है तो पृथ्वी का संतुलन है
जल है तो जीवधारियों का संकलन है
जल है तो बादलों से भरा गगन है
जल है तो महासागर का फैला आंगन है
जल है तो सागर में जनजीवन है
जल है तो जमीन पर अन्न है
जल है तो एक आंदोलन है
जल है तो नदियों में संबोधन है
जल है तो सदैव शांत दहन है
जल है तो आनंद का आगमन है
जल है तो वसुंधरा में कंपन है
जल है तो सिंचित भूमि का तन है
जल है तो हर्षित पौधों का मन है
जल है तो आकर्षित करता वन है
जल है तो शीतल बहती पवन है
जल है तो ऊर्जा का स्त्रोत ईंधन है
जल है तो ऊर्वरक मृदा का मधुबन है
जल है तो कृषि में उन्नत उत्पादन है
जल है तो जल परिवहन है
जल है तो हम आप में कथोपकथन है
जल है तो अंतिम संस्कार के लिए चंदन है
जल है तो आत्मा में स्पंदन है
जल है तो भारत माँ का पद प्रक्षालन है
जल है तो आसान हर जतन है
जल है तो जल का अभिवादन है
जल है तो जल को नमन है वंदन है आलिंगन है
जल है तो जल धरा पर जीव का अभिनंदन है
जल है तो तीर्थ, मोक्ष,साक्षात भगवन है
जल नहीं तो समझ लिजिए पतन है
जल नहीं तो जीवन के अध्याय का विघटन है
अब जाग जाइए कृपा निधान
आप सुन रहे हैं मेरी जबान-ये आदित्य की ही कलम है श्रीमान

पूर्णतः मौलिक स्वरचित सृजन
आदित्य कुमार भारती
टेंगनमाड़ा, बिलासपुर, छ.ग.

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