जलियांवाला बाग

इश्क हुआ था इसी माटी से
इसे ही सर आंखों पे उनको ढोना था
इस मिट्टी की तो बात अलग
इसी में खेल के जीना था
इसे ही ओढ़ के सोना था
ज़र्रा ज़र्रा इसी माटी का
उनको अंत तक होना था
याद रखेगा देश इसे भी
डायर का खेल घिनौना था
दीवानों के रक्त से सन कर
इस मिट्टी को देश का तीरथ होना था
ये जलियांवाला बाग का
अन्तिम रक्तिम कोना था
देशभक्तों के लिए इस माटी को
चन्दन सरीखा ही अंत में होना था
रक्त की बूंदे जो गिरी धरती पे
मिट्टी से मिलकर आग का गोला होना था
दीवानों के लिए आजादी का परचम होना था
ये तो जलियांवाला बाग का अंतिम रक्तिम कोना था
~ सिद्धार्थ

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मुझे लिखना और पढ़ना बेहद पसंद है ; तो क्यूँ न कुछ अलग किया जाय......
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