कविता · Reading time: 1 minute

जलन

दहक उठी है ये सारी बस्तियाँ किसी के आग में
जलन सी अब मच रही है कोयल की राग में
दुख दुना हो जाता है दूसरों का हर हिसाब देखकर
आँखें भी धोखा देती है उसको कामयाब देखकर
मुँह मोड़ लेता हूँ दूसरों की खुशियों को देख
अब तो वो सहारा भी नहीं है जो पहले था मेरा ईश्वर
आज खिताब मेरे हाथ मे है कल किसी ओर के हाथ में होगा
ललचाएगा भी तब वो मुझे जब उसके साथ किसी दुसरे का नाम होगा
बेगानों की खुशियां देख एक तूफान ऐसा भी उठता है
मेरे सर पर छत दे जाए और दूसरों के ऊपर बारिश का नाच दिखाता है
शर्म से सर भी झूका है, हाथ से कलम भी छुटा है
लोग आगे निकल गए मगर मेरे लिए वक्त वहीं पर रूका है
कल कोई मेरे लिए फिक्र करता था आज दुसरों के लिए मरता है
आग तो अब उस मशाल में लगती है जिसमें पानी का सेतु ढहता है
तालियों की गर्जना मेें एक आवाज एसी भी गूँजती है
जो न चाहते हुए भी मेरा अभिनन्दन करती है
लालसा होती है किसी एक चीज को पीने की अगर दूसरा न ले जाये
खून तो तब खोल उठता है जब कोई हमसे ही पहले बाजी मार ले जाये
खुलें आसमान में अब अपवादों के साये दिखते है
उस शोर की क्या बात करें जिसमें केवल नाम बिकते है
-शिवम राव मणि

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एक दौर जो गुज़र गया मगर ज़िन्दा है, वक्त के निशान कोई मिटा नहीं जाता
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