मुक्तक · Reading time: 1 minute

“जरूरत सोंच बदलने की”

देखा मैंने एक दिन, समाज को करीब से,
देखी लोगों की भावनाएं, और जिम्मेदारियाँ |
हर कोई लगा है कम करने में, अपनी जिम्मेदारी ,
जी चुराता है वह काम के प्रति वफ़ादारी से |

चाहिए उसे शत प्रतिशत, परिणाम सब का,
मगर कर्तब्य पथ पर एक-एक क्षण को है चुराता|
आज सेवक से लेकर स्वामी तक स्वयं से भागता दिख रहा है —

अपने काम को दूसरों पर टिकाते दिख रहा हैं,
प्रगति की झूठी मेखला पहने,
समाज में अपने को श्रेष्ठ दिखा रहा हैं |

जिस दिन हम मान लेंगे , काम को अपनी जिम्मेदारी ,
फिर नहीं चाहिए कोई मोटीवेशन,या नई सोंच
न तो किसी महात्मा या साधु की जरूरत,
और न ही किसी आइडियल इंसान की,

हम खुद एक आदर्श बन जाएँगे !

मगर उससे पहले उस चोर भावना को ,
निकाल देना होगा अपने अंतर्मन से,
जो किसी के सामने बाहर नहीं आती ,
यहाँ तक की अपने सामने भी नहीं |

हम छलते हैं स्वयं को सौ-सौ बहाने बनाकर,
संतोष कर लेते हैं अपनी ही झूठी दलीलों पर,
यह जानते हुए भी की यह,
केवल हमारी कोरी मानसिकता है,
कुछ नहीं मिलेगा हमें इससे,
सिवाय
हार,बदनामी गरीबी और पिछड़ेपन के ||

अमित मिश्र

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