कविता · Reading time: 1 minute

जरा अपने अन्दर देखो

अब ये कैसा अजीब सा शोर है
सन्नाटे के बीच हिंसा घनघोर है ,
कैसे करे कोई एक दूजे पर यकीन
जब खुद के अन्दर बैठा एक चोर है ।

क्यु ना सब ही है शांत रहे
फिर क्यु ये माहौल अशांत रहे,
बाहर से भरे पडे हो झूठ फरेबी से
और सोचते हो की अन्दर एकांत रहे ।।

©नितिन पंडित

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