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जरा अदब से मुझसे मिला करो।

तेरी मुफलिसी का जबाब हूँ जरा अदब से मुझसे मिला करो।
मैं बीती रात का ख्वाब हूँ जरा अदब से मुझसे मिला करो।
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तेरे लम्स जिसको उम्र भर तरसा किये इस दहर में।
मैं वही फसले शबाब हूँ जरा अदब से मुझसे मिला करो।
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फ़िरक़ों में सबको बांट कर करते अमन की बात तुम।
मैं मज़हबी दोआब हूं जरा अदब से मुझसे मिला करो।
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तुम ख़ार थे तुम ख़ार हो तुम ख़ार ही रह जाओगे।
फीका हूँ पर गुलाब हूँ जरा अदब से मुझसे मिला करो।
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कुछ बर्बरों को देखकर तुम मत मुझे बयां करो।
मैं इक हसीं मेहराब हूँ जरा अदब से मुझसे मिला करो।
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जो गोद में लेकर तुझे दुलरायें नींदों ख़्वाब दे।
मैं इक वहीं महताब हूँ जरा अदब से मुझसे मिला करो।
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” नज़र ” जिसकी खोज में तेरी नज़र बेताब थी।
मैं ही वही किताब हूँ जरा अदब से मुझसे मिला करो।
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कुमारकलहँस, 13,05,2022, बोइसर, पालघर।

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Kumar Kalhans
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