May 14, 2017 · कविता

जमाने की पोल... हरियाणवी रागनी

ढ़के हैं तो ढ़के रहण दे, तू ढ़के रहण दे ढ़ोल
ना खुलवावे तू ना खुलवावे, र जमाने की पोल

बात चाल पड़ी तो र मैं बात सारी बोलूँगा
बेशक बुरी लागियो, मैं राज सारे खोलूँगा
कहदी जो कहदी ना फेर पाछे डोलूँगा
झूठ नहीं बोलूंगा, च थाम आपे ला लियो तोल
ढ़के हैं तो ढ़के रहण दे, तू ढ़के रहण दे ढ़ोल
ना खुलवावे तू ना खुलवावे, र जमाने की पोल

माटी में माटी होके कमाण आले खुबाती सोगे
पैसा की मारा मारी में, गरीब के हिमाती खोगे
काल गाम के लंगवाड़े थे, वे आज पंचाती होगे
सुक के न पाती होगे, नशे पते का लागज्या झोल
ढ़के हैं तो ढ़के रहण दे, तू ढ़के रहण दे ढ़ोल
ना खुलवावे तू ना खुलवावे, र जमाने की पोल

बेटी की करनी त बाबु अपना मुँह लको रे र
उल्टे सीधे गोत भिड़ा खुद गाम में बटेऊ हो रे र
पुरख़ाँ की इज़्ज़त में देखो ये कांडे बो रे र
नाश करण ने हो रे र, मैंने सारे पत्ते दिए खोल
ढ़के हैं तो ढ़के रहण दे, तू ढ़के रहण दे ढ़ोल
ना खुलवावे तू ना खुलवावे, र जमाने की पोल

बड़े अजीब हो रहे हैं आज दुनियां के म्हा चाले
जितने जिनके धोले कॉलर, वे उतने दिल के काले
भाई गेल्या जुत बजा के, गल के लाये साले
गाम भगोतीपुर आले, ना रहया साच्चै का मोल
ढ़के हैं तो ढ़के रहण दे, तू ढ़के रहण दे ढ़ोल
ना खुलवावे तू ना खुलवावे, र जमाने की पोल

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मैं वो लिखता हूँ, जो मैं महसूश करता हूँ, जो देखता हूँ, कभी कभी अपने...
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