जब से हमारे पाँव, रक़ाबों में आ गए,

21 जुलाई 2015
==========

जब से हमारे पाँव रकाबों में आ गए,
जितने भी शहसवार थे घुटनों में आ गए,

कल शाम उसको देखा तो बस देखता रहा,
कल शाम गुज़रे दिन मेरी आँखों में आ गए,

वैसे भी उनको जान से जाना था एक दिन,
अच्छा किया जो खुद ही निशानों में आ गए।

इस पार में अकेला खड़ा सच के सांथ था,
उस पार वाले सब तेरी बातों में आ गए,

अब किस तरह से हक़ में हमारे हो फैसला,
नाबीना , चश्म दीद गवाहों में आ गए,

ये देखना है जाँ से गुज़रता है कौन अब,
हम चढ़ के खुद तुम्हारे मचानों में आ गए,

अशफ़ाक़ ये कलम है या जादू की इक छड़ी,
तेरे लिखे जो ख़त थे रिसालों में आ गए,

©अशफ़ाक़ रशीद.

रक़ाब=घोड़े की ज़ीन का पैर दान
शहसवार=घुड़सवार

3 Comments · 20 Views
You may also like: