कविता · Reading time: 1 minute

— जब से तुन्हें देखा —

वो शायद फरवरी का महीना था
जब मैने तुम्हे पहली बार देखा था
अनजान बन कर मुलाकात हुई थी
उस के बाद हर बात हुई थी

एक गुजारिश की थी मैने
जब कविता के वोट का दौर था
तुम बन केआई संग मेरे
वो न जाने कैसा दौर था

वो प्रतियोगिता तो चली गयी
पर तुम से गुफ्तगू शुरू हो गयी
फिर तो यही लगने लगा जैसे
प्यार की शुरुआत हो गयी

कल्पना से हटकर तुम्हे सोचा था
पर तुम्हारी तस्वीर से शुरुआत हो गयी
पर जहाँ जहाँ भी गुजारा वक्त तुमने
उस वक्त से जिन्दगी सरोबोर हो गयी

हर वो लम्हा गुजारा फिर लड़ कर
कभी आपस में झगड़ कर
और याद कर कर और उस याद
से बस प्यार कर कर

आज बेशक दूरियां ज्यादा हैं
पर दिल से दूरी आज भी नही है
जब से तुम्हे देखा दिल में , प्यार
की कसक सच आज भी है

वादा किया है साथ निभाने का
सांस की आखरी सांस तक
यह तुम याद रखा जीवन भर
कोइ ऐसा भी आया था प्यार बनकर

मेरी मोहोब्बत कल भी वही थी
मेरी मोहोब्बत आज भी वही है
दिल में प्यार जितना कल तक था
उस से ज्यादा कहीं आज भी है.

अजीत कुमार तल

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