कविता · Reading time: 1 minute

जब रात की तन्हाई

*जब रात की तन्हाई*
मिले हो तुम मेरी धड़कन,
सांसों में इस कदर समाई हो।
सारी रात जग देता हु,
जब रात की तन्हाई में।
पल पल तेरी होठो पे,
मुस्कान सुनाई देती हैं।
पायल की झंकार से,
आने की सुनाई देती हैं।
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रचनाकार कवि डीजेन्द्र क़ुर्रे “कोहिनूर”
पीपरभवना, बिलाईगढ़, बलौदाबाजार (छ. ग.)
‌8120587822

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