जब रक्षक ही भक्षक बन जाए

जब रक्षक ही भक्षक बन जाए
क्या करेगा शेर बिचारा
खुद ही जो जंगल कटवाए
बनकर बैठा है रखवाला
कितने जंगल सिमिट गए
कितने तब्दील हुए मैदानों में
कितनी वन भूमि गायब हुई
कितनी चली गई विकासों में
वन भूमि उत्खनन बचाने
कई महकमें बैठे हैं
करोड़ों अरबों खर्च है इनका
संपदा नित्य घटा बैठे हैं
कैंसा है विकास का पहिया
ना जाने कहां रुकेगा
तब तक शायद घायल धरा पर
कुछ भी नहीं बचेगा
बेईमान नेता अफसर
सुनो माफिया कालो
आने वाली संतति के खातिर
कुछ तो इसे संभालो
जल जंगल जमीन और नदियां
कुदरत की अनमोल धरोहर हैं
हर कीमत पर इन्हें बचाना
आज की बड़ी जरूरत है
एक पौधे को पेड़ बनने में
५० _१०० साल लग जाते हैं
क्षुद्र स्वार्थों के चलते
बे पल भर में कट जाते हैं
अंधाधुंध दोहन प्रकृति का
समझो महाविनाश है
मानवता को खतरा है
जीवन का सत्यानाश है

सुरेश कुमार चतुर्वेदी

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