कविता · Reading time: 1 minute

जब मैं जाऊँ…..

जब मैं जाऊँ…..

सखी तुम आना करके श्रृंगार
सखी तुम आना बनके बहार ,

सखी तुम आना नैनन में ले के प्यार
सखी तुम आना हो के बेहद बेकरार ,

सखी तुम आना लेकर उलाहनों का अंबार
सखी तुम आना करने बची हुई तकरार ,

सखी तुम देना मेरे बच्चों को अपना दुलार
सखी तुम देना माँ – सी बन कर लाड़ – प्यार ,

सखी तुम आना और पोछना आँखों का कोर
सखी तुम आना और थामना यारी का छोर ,

सखी तुम आना बनके दिल से मेरी हकदार
सखी तुम आना बनके फिर से मेरी दरकार ,

सखी तुम आना सजाने अपने हाथों से यार
सखी तुम आना करने मुझे आखिरी प्यार ।

स्वरचित एवं मौलिक
( ममता सिंह देवा , 09/03/2021 )

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" लेखन से अपने मन को संतुष्ट और लेखनी को मजबूत करती हूँ " मैं भारत से Pottery & Ceramic विषय से Masters ( BHU 1993 ) करने वाली पहली…
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