जित मन चाहे बैठो, दिल अब नाव हो गया

(मुक्त छंद)

कपड़े की सिकुड़न बनी, भूषाचार-सु लोक |
नहीं पता यह लड़कियाँ या लड़कों की भौंक||
या लड़कों की भौंक, मात्र पतलून हिल रही |
नृत्यमयी भोली सूरत की दून खिल रही ||
कह “नायक” कविराय, प्रेम जग-पाँव हो गया |
जित मन चाहे बैठो, दिल अब नाव हो गया||

बृजेश कुमार नायक
“जागा हिंदुस्तान चाहिए” एवं “क्रौंच सुऋषि आलोक” कृतियों के प्रणेता

भूषाचार =फीश् अन(Fashion)
सु लोक=सुुंदर संसार
जित=जिधर

Happy holi.

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