जब भूखे बच्चे न अकुलायेंगे

जब भूखे बच्चे न अकुलायेंगे
जब हर पेट अन्न से भरा होगा
जब माओं की सूखी छाती से
छीर की गंगा बह निकलेगी
जब लूटी-पीटी बेटी से कोई
जात-धर्म न पूछा जाएगा
ना चिन्ताएं होगी कोई बड़ी
ना भय का कहीं साया होगा
जब कोई बच्चा
मध्याह्न भोजन के लिए
स्कूल की चौखट न लांघेगा
जब कोई कपड़ों की अपनी लाचारी से
नंगे जिस्म को बेबस चेहरा न पहनायेगा
जब भादो में भी किसी का
आस का छप्पर न टूट के टपकेगा
जब अस्पतालों के खाटों पे जर्द चेहरे
मौत का भीख न मांगेगा
जब मासिक चक्र में किसी औरत को
राख,उपला, कपड़े का सड़ा सा टुकड़ा
काम न आएगा, तब जाके
विश्व पटल पर
राष्ट्र हमारा विकसित
राष्ट्र कहलाएगा
अभी तो हम लड़ते रहते है
पानी के कतारों में
मास्टर जी तो 10 भी नही बचे हैं
बच्चे दिखे हजारों में
बैल के जगहों पे, किसान दिखे खेत के आड़ों पे
अन्न का मुफ़ीद दाम मिलते दिखता नही बजारों में
अच्छे दिनों के सारे आस टूटे हैं
लोगों का लोगों पे विश्वास रूठे हैं
निराशा कि काली साया है बेरोजगारों में
हुक्मरानों की निर्लाजता तो देखो
देते हैं एक अनार का दाना
कहते हैं
बांट लो सौ बीमारों में…

…सिद्धार्थ

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मुझे लिखना और पढ़ना बेहद पसंद है ; तो क्यूँ न कुछ अलग किया जाय......
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