.
Skip to content

जन मानस के मन की बात

drpraveen srivastava

drpraveen srivastava

कविता

October 13, 2017

जनमानस के मन की बात

जनता का दुख दर्द जमा है, सुख चैन जमा हैं बैंकों में ।
जीवन का विश्वास जगा हैं, अवनि और अम्बरतल में।
रूपयों के लिये भीड़ हैं बैंको और ए0टी0एम0 में,
धीरज धरकर मन को शान्त कर भीड़ बढ़ी हैं बैंकों में ।
भीड़ देखकर पैर ठिठकते, आते ही बैंकों में ।
विश्वास और धैर्य छोड़ते साथ सभी का बैंकों में।
नमक, तेल पेट्रोल दवा सबकी आवश्यकता बैंको में,
एक हजार या दो हजार जो चाहे मिल जाये बैंकों में।
जनमानस की आवश्यकता, रूपया हैं बैंकों में ।
जीवन का उमंग उत्साह भरा हैं बैंकों में।
धक्कामुक्की, रगड़ा झगड़ा सब झेल रहे हैं बैंकों में।
तिल भर की जगह बची, कही नही हैं बैंकों में।
आपस का भाईचारा खूब निभाया बैंकों ने,
रूपया मिले ना मिले, साथ हमारा एकता हमारी बैंकों में।
भारत माता की जय विजय हमारी बैंकों में,
उल्लास खुशी से जमा हमारी जीवन की पूंजी बैंकों में।
कालेधन की काली छाया दूर करो इन बैंकों में।
समता की समरस छाया दो, बेकारी दूर करो, विवशता लाचारी दूर करो।
जीवन में धन की मांग चाहे पूरी न कर, आत्म विश्वास आत्म चेतना भरपूर देकर, जीवन का उत्साह बढ़ा दो,
नवजीवन का उपवास खत्म कर नवयुग का प्रारब्ध लिखों।
जीवन का अभाव खत्म कर नवयुग का आरम्भ लिखों।

डा प्रवीण कुमार श्रीवास्तव

Author
Recommended Posts
मन
मन से मन के दीप जला लो मन से मन को फिर महका लो मन से मन का मेल जो होगा हो जायेगा जग उजियारा..... Read more
मन की बात
मन मन की सब कोई कहे, दिल की कहे ना कोई। जो कोई दिल की कहे, उसे सुनता नही है कोई। मन पापी मन चोर... Read more
यह कोई कविता नहीं;मन से निकली आनायास एक आवाज़ है जो मन से निकलता गया;ढलता गया ;मैंने कविता मान लिया ;आप मानोगे तो ठीक नहीं... Read more
मन
मन - पंकज त्रिवेदी ** मन ! ये मन है जो कितना कुछ सोचता है क्या क्या सोचता है और क्या क्या दिखाते हैं हम...... Read more