जनता और जनार्दन

जनता और जनार्दन
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चूनावी जंग को तैयार
नेता जी निकल पड़े
देख सुखियि को रासते में
मन ही मचल पडें
गाड़ी रोक रास्ते में
जमीन पे उतर पड़े।
रोक रास्ता सुखीया का
पूछने लगे हाल
मेरे भाई इस कदर
क्यो लग रहा बेहाल।
आखिर वो वजह क्या
जो तेरा यह हाल है
सर पे छत ना लगता तेरे
ना पौकेट में माल है।
देख सम्मुख नेता जी को
सुखिया कुछ हैरान हुआ।
चीकनी चूपड़ी बातों को
सून-सून कर परेशान हुआ।
बोला मै गरीब हूँ
अब मौत के करीब हूँ
घर है टूटा-फूटा
ना घर में रोटी दाल है
जाडे़ का मौसम चल रहा
कम्बल है ना शाल है।
सुनकर बात सुखिया का
नेता जी सकुचाये,
कुटिल मुस्की लेकर मुख पे
थोड़ा सा मुस्काये।
फिर बोले
इस बार जीता दे मुझे
तेरा घर बनवा दुंगा,
जड़ा हो या गर्मी
कम्बल भी बटवा दुंगा।
जब तक काम ये पूरे ना हों
तब तक चैन न पाऊंगा
मायाधर ने सोचा तब हीं
जन-जन को चूना लगाऊंगा।
मायापति के बातों में
सुखिया आ चूका था
नेता जी की शख्सियत
उसे भा चूका था।
सुखिया खूदको ही
विधायक समझने लगा
हाथ मिलाया मायाधर से
संग- संग चलने लगा।
सोचता रहा मन में
नेता जी उदार है
कितने स्वच्छ, कितने सुन्दर
सरकार के विचार हैं।
इस दफा निश्चय ही
मैं मतदान करूँगा,
अपना ये बहुमूल्य मत
नेता जी के नाम करूँगा।
नेता जी की उदारता
मैं सबको बतलाऊंगा,
अपने साथ सौ दोसौ को
इनके पाले में लाऊंगा।
नेता जी को संग में लेकर
अपने घर वो आया,
गांव में जितने लोग बसे थे
सबको वहाँ बुलाया।
नेता जी ने शुरु की भाषण
जन-जन को भरमाया,
मुफ्त में चावल दाल मिलेगा
जनता को बतलाया।
अबकी जो हम जीत गये
पानी का नल लगवा देंगे,
टूटे-फूटे घर है जितने
पक्के हम बनवाँ देंगे।
हुआ चूनाव नेता जी जीते
दिल सुखिया का तोड़ गये,
जनता से जो किये थे वादे
बन्डल ही वह फोड़ गये।
फिर मौसम निर्वाचन का है
आप भी सुखिया मत बनना,
“सचिन” जो नेता सच्चा लगता
आप उसीको ही चूनना।
लेकिन मतदान पुनः करना।
©®पं.संजीव शुक्ल “सचिन”
5/2/2017
जय हिन्द, जय भारत।
जय मेधा,जय मेधावी भारत।

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