बेटी की महिमा

सूखा पीड़ित देख नगरी को
बेटी ने अवतार लिया ,
धरती से उत्पन्न होकर उसने
जनता का उद्धार किया ।
अन्न जल बरसा जनकपुरी में
पिता जनक को मान दिया ,
पितृ कुल की पहचान बनी वो
जानकी उसने नाम लिया ।
राजा कुंतीभोज सदा ही
बेटी कुंती पर गर्वित होते थे
जिसके सेवा सुशील गुणों से
दुर्वासा भी प्रसन्न रहते थे ।
दे दी शक्ति जिसे मुनिवर ने
देवों के भी आह्वान की
वो कुंतीभोज की बेटी कुंती
बनी निर्मात्री पांडु कुल की ।
यज्ञ से उत्पन्न हुई याज्ञसैनी
जो महाराज द्रुपद की बेटी थी
कुरूवंश की कुरूपता की
वो प्रमुख संहारक थी ।
कर प्रतिग्या अधर्म नाश की
भगवन का उसने नाम लिया ,
रक्षा कर नारी सम्मान की
प्रभु ने भी उसको मान दिया ।
राजर्षि अश्वपति की कन्या
सावित्री अटल व्रतधारी थी,
यमदेव की अमिट नियमावली
उसके ही समक्ष हारी थी ।
वह ऐसी बेटी थी जिसने
जीवन को भी जीत लिया,
पिता – पति दोनों के कुल का
उज्ज्वल उसने नाम किया ।
हर युग में , हर काल में
बेटी ने पहचान बनायी है ,
त्रेता,द्वापर से कलयुग तक
बेटी की महिमा छायी है ।
वेद पुराण और महाकाव्यों ने
बेटी की महिमा को गाया
बड़ा अभागा है वो समाज जो
गुण बेटी के जान न पाया ।

डॉ रीता
एफ-11,फेज़-6
आया नगर,नई दिल्ली- 47

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "बेटियाँ"

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