गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

जग को सजाने चला हूँ

जग सजाने चला हूँ
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*गीतिका*
दशा मैं हृदय की बताने चला हूँ।
स्वयं के प्रभो को मनाने चला हूँ।

जगत जिस जहर से जला जा रहा है।
अनल द्वेष की वह बुझाने चला हूँ।

भले भीर भारी मुझे भेद डाले।
मगर घाव सबके सुखाने चला हूँ।

हृदय आह सुनकर व्यथित हो रहा है।
कि सुख-युक्ति नर को सुझाने चला हूँ।

मनुज बुध्दि -जीवी विवेकी गुणी है।
इन्हीं सद्गुणों को बढ़ाने चला हूँ।

अँधेरा घना जन- हृदय में दुखों का।
अधर को हँसी -पथ दिखाने चला हूँ।

सकल भूमि ‘इषुप्रिय’ प्रभो का बसेरा।
बिछा प्रेम- गुल जग सजाने चला हूँ।

अंकित शर्मा ‘इषुप्रिय’
रामपुर कलाँ, सबलगढ(म.प्र.)

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