कविता · Reading time: 1 minute

जगाना

दिखा कसाईखाने के दबड़े में,
इक मुर्ग़ा,
बेबस हालातों में, लाचार मुर्ग़ा,
पंजे मुड़े हुए, पंख टूट कर बिखरे,
तो कुछ जुड़े हुए,
इस दुशवारी में भी पर,
गर्दन थी उसकी अकड़ी हुई,
पूछा मैंने,
इस हालात में भी गरिया रहा है,
बेटा शाम को तू मुझे किसी प्लेट में,
नज़र आ रहा है,
चल आज इक बात बता,
सुबह होने से पहले ही है तू उठ जाता,
बिना किसी आलस्य के अपना धर्म निभाता,
हर रोज़ बाँग देकर मनुष्य को है जगाता,
फिर भी तू है परोसा जाता,
तू ही काटा जाता,
मेरी सारी बकवास सुनने के बाद,
मुर्ग़े ने मुँह खोला और बोला,
सुन लड़की इतिहास गवाह है,
जो समाज को है जगाता,
वो सबसे पहले है काटा जाता,
जगाना अपराध की श्रेणी में है आता,
बस इस अपराध की सज़ा हूँ मैं पाता,
इसलिए काट के हूँ परोसा जाता,
सुन कर मुर्ग़े की बात,
निशब्द थी मैं,
मौन रहा फिर कई घण्टे मेरे साथ,
मौन, केवल मौन…..

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