जगदीप जाफरी ( सूरमा भोपाली) बालीवुड के दूसरे जॉनीवाकर

नमस्कार स्वागत है आप सबका नारद टीवी पर मैं हूं अनुराग सूर्यवंशी आज हम बात करने जा रहे है बालीवुड के उस हास्य अभिनेता की जो 1950 के दशक से बालीवुड मे अपने अभिनय का लोहा मनवाते रहे हैं वे एक ऐसे अभिनेता हैं जिन्होने अपने बेबाक बोली से हर एक आयु वर्ग को खूब हंसाया । 1975 में आई फिल्म शोले में उनके द्वारा सूरमा भोपाली का निभाया हुआ किरदार इतना लोकप्रिय हुआ की लोग इन्हे असल जिंदगी में सूरमा भोपाली नाम से ही पुकारने लगे ।यह थी उनके अभिनय की छाप । वह एक कौन है जी आपने बिल्कुल सही पहचाना हम बात कर रहे हैं अपने चेहरे की बनावट और धमाकेदार कॉमेडी के विस्फोट से हंसियो का गुबार बिखेरने वाले जगदीप साहब के बारे मे जिनका कल रात तङके 81 साल की उम्र मे निधन हो गया ।हंसमुख चेहरा रगो में केवल -ब-केवल खुशियो की लहर से सबकी नजर अपनी तरफ खिंचने वाले जगदीप साहब का जन्म 29 मार्च सन् 1939 में मध्यप्रदेश के दतिया जिले में हुआ था । इनका पुरा नाम सैय्यद इस्तियाक अहमद जाफरी था । इनका बचपन बहुत ही गरीबी और तंगीहाली मे बीता । भारत के विभाजन के वक्त जगदीप साहब अपनी मां के बॉम्बे आ गए जो इस समय मुम्बई के नाम से जाना जाता है । उस समय उनकी उम्र महज 7-8 बरस की थी । इनके पिता का शाया इनके जन्म के कुछ समय बाद ही उठ गया अतः इनका लालन-पालन भरण-पोषण इनकी मां ने किया । पिता का इनके अल्पायु मे ही गुजर जाने से अपने जीविकोपार्जन के लिए इनकी मां यतीमखाने में बच्चो के लिए खाना पकाया करती थी । जिससे उनका नन्हा बालक जगदीप पढ सके स्कूल जा सके । पर गरीबी के आगे जगदीप का मन पढ़ाई-लिखाई में न लगता । एक दिन नन्हे जगदीप के मन में यह ख्याल आया की क्यो न मैं और बच्चो की भांति कोई काम करूं क्या रखा है पढ़ाई -लिखाई में ये बच्चे जो काम करते हैं कहां पढते है मुझे अपने मां को आराम देना चाहिए मेरी मां मेरे लिए कितनी तकलीफे सहती है और जाकर सारी बात नन्हे जगदीप ने अपने मां से कह डाली । मां ने लाख जिद की समझाने की कि बेटा पढ़ाई लिखाई पर ध्यान दो पर जगदीप अपने मुफलिसी के आगे कुछ भी सुनने को तैयार नही थे । और नन्हा जगदीप भी दूसरे बच्चो की तरह जाकर दिन-रात काम करने लगे । कभी वो पतंग बनाते तो कभी साबुन बेचते और ऐसे ही वो अपना जीवन काटने लगे । आखिर वह दिन आ ही गया जब इनकी किस्मत ने एक नया मोड़ लिया । इनके साथ एक ऐसा वाकिया घटा की जिस सड़क पर जगदीप साहब बैठकर साबुन और पतंगे बेचा करते थे । वहां पर एक दिन एक आदमी आया जिसे फिल्म में काम करने के लिए छोटे-छोटे बच्चो की तलाश थी । जिसे फिल्म मे केवल उन छोटे-छोटे बच्चो को बैठना था वहां केवल ब केवल शरीक होना था । उस आदमी ने जब सङक के एक कोने में बैठे नन्हे जगदीप को देखा तो जाकर उससे बालक से पूछा की क्या तुम फिल्मो में काम करोगे और जगदीप साहब ने जब फिल्म नाम सुना तो उन्हे कुछ भी समझ में नही आया की यह आदमी कहां काम करने कोने बोल रहा है क्योंकि नन्हे जगदीप के ऊपर गरीबी सर चढ के बोल रही थी दो वक्त का भोजन जुटा ले यही बङी बात थी फिल्म देखना तो दूर की बात रही । तब उस आदमी ने कहां फिल्म मतलब आपको स्टुडियो में एक्टिंग करनी पड़ेगी और सुन नन्हे जगदीप तुरंत बोल पड़े पैसा कितना मिलेगा । उस आदमी ने कहां तीन रूपए और यह सुनकर जगदीप के मन में हर्ष और उमंगो का लड्डू फूट पड़ा और नन्हा जगदीप तीन रूपए सुनकर फिल्मो मे काम करने के लिए फौरन हांमी भर दी । और नन्हे जगदीप ने कहां ले चलो हमें फिल्म स्टुडियो तो उस आदमी ने कहां अरे अगले दिन आकर तुम्हे ले जाऊंगा अभी नही । और अगले दिन इनकी मां इन्हे लेकर फिल्म स्टुडियो पहुंची और वहां दृश्य यह था की कुछ बच्चे नाटक कर रहे थे और नन्हे जगदीप सहित अन्य बच्चो को बैठकर उसे देखना था उनका हौसलाअफजाई करना था । जब बच्चो काम नाटक चल ही रहा था की तभी एक डायलॉग आया जो की उर्दू में था जिसे नाटक कर रहे बच्चो को बोलना था पर कोई भी बच्चा यह डायलॉग ताल एवं स्वर में नही बोल पा रहा था और नाटक वही रूकने के मोङ पर आ गया । जब यह दृश्य नन्हे जगदीप ने देखा तो अपने आस-पास बैठे दूसरे बच्चो से पूछे की अगर मैं यह डायलॉग बोलूं तो क्या होगा इसका जवाब सभी बच्चो ने यह कहकर दिया की इसके लिए तुम्हे ज्यादा पैसे मिलेंगे यानि की तीन पैसे के जगह 6 पैसे मिलेंगे और उस 6 रूपए ने नन्हे जगदीप को इतना प्रेरित किया की उन्होने उठकर बोला अगर आपकी अनुमति हो तो यह डायलॉग मैं बोलूं । मेरे दोस्तो को उर्दू जैसी क्लिष्ट भाषा बोलने में दिक्कत हो रही हैं और रही बात मेरी तो मैं इसे बङे ही सुगमतापूर्वक बोल सकता हूँ क्योकि मेरी मातृजबान ही उर्दू है। यह सुनकर उस फिल्म के डायरेक्टर ने कहां की ठीक हैं बालक यहां आओ और बोलकर दिखाओ हमको सुंदर नही देखना हैं हमे तो हुनर देखना हैं और इस लाइन से नन्हे जगदीप अच्छा खासा प्रभावित हुए थे । यह डायलॉग बोलने के लिए इन्हे दाढ़ी -मोछे लगाई गई और उन्होने यह डायलॉग इतनी बेबाकी से बोला की उनके प्रशंसा में बैठे वहां सभी लोगो ने तालिया बजाई और कहां आगे जाकर यह लड़का बहुत नाम करेगा और नन्हे जगदीप को मकाम तक पहुंचने के लिए पहली सीढ़ी उन्हे मिल गई जिसका उन्हे बेसब्री से इंतजार था । और वहां से उन्होने बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट अपने जिंदगी की शुरुआत की । मशहूर निर्माता -निर्देशक बी आर चोपड़ा एक फिल्म बना रहे थे जिसका नाम ” अफसाना था जिसे प्रोड्यूस किया था यश चोपड़ा ने जिस फिल्म में जगदीप ने अभिनय किया था । उसके बाद तो ये बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट लगातार फिल्मो में काम करने लगे और कभी भी पीछे मुङकर नही देखा और वे अपनी मेहनत, लगन और कर्मठता से अपने कदम बढ़ाने लगे । फणी मजूमदार ने इन्हे अपनी फिल्म “धोबी और डाक्टर के लिए इन्हे कास्ट किया जिसमे नन्हे जगदीप ने किशोर कुमार का रोल निभाया था और इनकी सहनायिका थी चाइल्ड आर्टिस्ट आशा पारेख । जब इस फिल्म को सिनेमाहॉल में लगाया गया तो इसे देखने के लिए भारी मात्रा में दर्शको का जमावड़ा लगा और जगदीप के अभिनय की लोगो ने खूब सराहना की । फिल्मो में इतनी भीङ देखकर उस जमाने के मशहूर निर्माता-निर्देशक विमल रॉय ने यह मन बना लिया था कुछ भी हो यह लड़का अब हमारे फिल्मो मे काम करेगा और इन्होने फिल्म बनाई “दो बीघा जमीन ” जिसमे जगदीप साहब को रोल मिला और उनकी रकम 300 रूपए तय की गई । उसके बाद तो जगदीप साहब ने फिल्मो में बतौर हीरो भी काम किया हालांकि इनकी उतनी इच्छा नही थी की वो फिल्मो में बतौर हीरो काम करे उन्हे तो कॉमेडी ही करना अच्छा लगता था जिसमे वो पूरा डूब जाते थे। फिर आई उनकी फिल्म भाभी को कौन भूल सकता है जिसमें नंदा इनकी हिरोइन थी । जगदीप साहब एकलौते ऐसे चाइल्ड आर्टिस्ट है जिन्होने 35 साल लगातार काम किया और बिल्कुल भी ब्रेक नही लिया । बचपन से जवानी -जवानी से बुढ़ापे तक जगदीप साहब अपने कामेडी के लिए छाए रहे । फिल्म “अंदाज अपना अपना में ” जगदीप साहब ने सलमान खान के बाप का किरदार निभाया था । जब ये बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट काम कर रहे थे तो इनकी आमदनी बढ़ती ही जा रही थी । उन पैसो से सबसे पहले इन्होंने मुम्बई के जे जे हास्पिटल के नजदीक एक छोटी सी झोपड़ी बनाई और उसके बाद माहिम में एक खोली ली और जब ये फिल्म कम्पनी AVM के साथ काम काम कर रहे थे तब उन्होने खूब दमङी कमाई और तब उन्होंने उस जमाने में मद्रास कहे जाने वाले चेन्नई मे अपना एक बंग्ला बनवाया और उसके बाद एक बंग्ला बॉम्बे में भी बनवाया और अपनी गरीबी से जगदीप आज बहुत ऊपर आ चुके है सब उनकी मेहनत, लगन और अपने किरदार में पूर्णता आत्मसमर्पित होने का परिणाम है । ये किस्सा भी बहुत मशहूर रहा की जगदीप साहब शोले फिल्म में सूरमा भोपाली का किरदार नही निभाना चाहते थे और उनके इस किरदार को निभाने के लिए मनाया मशहूर पटकथा लेखक सलीम-जावेद की जोड़ी ने और आखिर में सूरमा भोपाली के किरदार को शूट किया गया और यही किरदार पूरी तरह से अमर हो गया और जगदीप साहब को एक अलग पहचान मिली यहां तक की लोग इन्हे सूरमा भोपाली के ही नाम से जानने लगे । जगदीप साहब ने यह लोकप्रियता देखकर सूरमा भोपाली नाम की एक फिल्म भी बनाई जिसे खरीदने को कोई तैयार नही था । इस फिल्म में जगदीप साहब के साथी कलाकारो ने काम किया था । ये फिल्म हल्की-फुल्की हँसाने वाली फिल्म थी पर जगदीप साहब ने अपने फिल्म को बेचने के लिए कोई बाजारू तौर तरीका नही अपनाया ऐसे थे जगदीप साहब जो अपने जीवन से संतुष्ट थे । यदि इनके निजी जीवन की तरफ रूख करे तो ज्ञात होता है की इनकी पहली बीवी नसीम बेगम से इन्हे जो बच्चे हुए उनका नाम है हुसैन, शकीरा, शफी और सुरैया । इनके दो लड़के और हुए नावेद जाफरी और जावेद जाफरी इनमे से जावेद जाफरी को आपने धमाल फिल्म में खूब हंसाते हुए देखा होगा । नावेद और जावेद दोनो एक पॉपुलर टीवी होस्ट भी है । ब्लैकन ह्वाइट सिनेमा से लेकर कलर सिनेमा दिलीप कुमार के बचपन के रोल से लेकर सलमान खान के पिता के रोल तक । जगदीप साहब ने सभी को हंसाया और सभी का खूब मनोरंजन किया । इन्होंने बालीवुड में 400 से अधिक फिल्मो मे काम किया और इन्हे कई बेहतरीन आवार्ड आवार्ड से भी सम्मानित किया गया । नारद टीवी द्वारा इस वीडियो के माध्यम से जगदीप साहब को भावभीनी श्रद्धांजलि भगवान् उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान करे । फिल्म जगत के इतिहास में जगदीप साहब का नाम सदैव गर्व से लिया जाएगा ।

🌟🌟 शोध एवं लेख 🌟🌟 :-: RJ Anand Prajapati (Azamgarh) Group C Writer for Naarad TV

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