कविता · Reading time: 1 minute

जख्म पर जख्म

वह
जख्म पर जख्म दिये जा
रहे हैं
हम अपने होठों को
खामोशी के साथ
सिलते चले जा रहे हैं
दरिंदगी की सारी हदें पार करके भी
वह खुद को एक बहुत अच्छा इंसान
साबित करने की कोशिश में
हरदम ही लगे रहते हैं
किसी के दुख दर्द से उन्हें
लेशमात्र भी सरोकार नहीं
समाज में भी ऐसे ही लोगों की
जयजयकार है
एक अजीब तमाशा है यह दुनिया
हम तो चुपचाप
यह सारे सितम
एक के बाद एक तीरों की
लगातार हो रही बौछारों की तरह
अपने सीने पर सहे जा रहे हैं।

मीनल
सुपुत्री श्री प्रमोद कुमार
इंडियन डाईकास्टिंग इंडस्ट्रीज
सासनी गेट, आगरा रोड
अलीगढ़ (उ.प्र.) – 202001

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