जंगली और पालतू कुत्ते की मित्रता (व्यंग्य- कविता)

जंगल से इक आया कुत्ता ।
बूटी मुँह में दाबे कुत्ता ।
उसे देखकर भौंका कुत्ता ।
जंगल के फिर उस कुत्ते को,
इस कुत्ते ने मित्र बनाया ।
मालिक के घर ले जाकर फिर,
कुत्तों का रहना सिखलाया ।
अब ,
साथ-साथ रहते हैं कुत्ते ।
धूप-छाँव सहते. हैं कुत्ते ।
साथ-साथ खाते हैं कुत्ते।
साथ-साथ गाते हैं कुत्ते ।
साथ-साथ सोते हैं कुत्ते।
साथ-साथ रोते हैं कुत्ते ।
कुत्ते ने जब देखा मौका ,
बूटी लेकर भागा कुत्ता ।
बूटी कहीं छुपाकर मित्रो !
पुन: लौटकर आया कुत्ता ।
उस जंगल के कुत्ते ने जब
देखा बूटी ग़ायब है ,तब
इस चोरी का आवेदन,फिर
पहुँचाया जंगल-न्यायालय ।
जंगल के कुत्तों के जज़ ने
कहा कि- यह तो महा ज़ुर्म है,
अब सफाई में अपनी कुछ तू
कह दे कुत्ते चण्ड – मुसण्ड ।
वरना दूँगा अभी मैं तुझको ,
बड़ी सजा या मृत्यु – दण्ड ।
सुनकर जज़ का बड़ा फ़ैसला ,
कुत्ता चींखा और चिल्लाया ।
रोते हुए कहा फिर जज़ से ,
मैं मामूली कुत्ता हूँ ।
सेवा का मैं मुद्दआ हूँ ।
इंसानों ने पाला मुझको ।
बचा-खुचा खिलाया मुझको ।
इसीलिए जो भी सीखा है ।
सभी सिखाया इंसानों ने ।
माना कर्म बहुत नीचा है ।
क्षमा करें जज़-साहिब़ मुझको,
चोरी करना भी मैंने तो ,
इंसानों से ही सीखा है ।

ईश्वर दयाल गोस्वामी ।
कवि एवम् शिक्षक ।

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