छोड़ भवि यूँ इंतज़ार करना

रोज वादे यूँ ही झूठे यार करना
आ गया हमको भी दो के चार करना ।।

लो हुई बेटी गरीबों की विदा अब
चार शाने उसके तुम तैयार करना ।।

रोज ही आती हैं लाशें सरहदों से
सिर्फ गुर्राना मगर मत वार करना ।।

रात जिसकी याद में ही बीती हो
सुबह होते ही उसे बेदार करना ।।

प्यार की ये ख्वाइश जिन्दा रखो तो
कब्र में ही तुम विसाले यार करना ।।

साथ आया कौन है जो जायेगा
छोड़ “भवि” अब यूँ इंतज़ार करना ।।

*****शुचि(भवि)****

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Physics intellect,interested in reading and writing poems,strong belief in God's justice,love for humanity.
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