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छोटी छोटी बातें

aparna thapliyal

aparna thapliyal

कविता

June 9, 2017

पानी
आँखों के समंदर मे हहराता खारा पानी
निशब्द रह कर भी सुना जाता है
दर्द की परतों में दबी सुन्न कहानी।

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बचपन

गये लम्हे वो बचपन के फिर से याद आते हैं
मासूमियत पीछे छूटने के गम सताते है।

चलो फिर से उन्ही गलियों में हम चक्कर लगा आयें
गई यादों के बिखरे मोतियों को बीन कर लायें।

पिरो उन मोतियों को फिर से इक माला बनाते हैं
झूला आम की डाली पे फिर से झूल आते हैं।

गली में दौड़ कर साइकिल का चक्का फिर चला आयें
बनाया था जो रावण कतरनों से वो जला आयें।

पुराने खंडहरों में नये दीपक चल जलाते हैं
नये बचपन की आँखों में चलो सपने सजाते हैं।
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दिखावा

नादानी हैै दिखावा
खोखलेपन की –
निशानी है दिखावा
सत्य ही शिव है
शिव ही सुन्दर है
शिव होने के लिए
सत्य ही है पहनावा
फिर निहायत
गैर ज़रूरी है दिखावा।

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