कविता · Reading time: 1 minute

छोटी-छोटी खुशियां

छोटी-छोटी खुशियों की चाह लिए बैठा हूँ,
खुशियों की किमत नहीं होती ये सुनता आ रहा हूँ,
पर फिर भी उन्हीं की किमत चुकाने के लिए कमाता जा रहा हूँ
खुद के अरमानों को दफन कर
उनकी कबर पर महल बना रहा हूँ,
अपनों की खुशी की लिए अपनी खुशी न्यौछावर हर रोज कर रहा हूँ।
छोटी-छोटी खुशियों की चाह लिए बैठा हूँ,
खुशियों की किमत नहीं होती ये सुनता आ रहा हूँ,
पर फिर भी उन्हीं की किमत चुकाने के लिए कमता जा रहा हूँ
खो देता और कुछ पा लेता हर रोज हूँ,
हर रोज ठोकर और धोखा में खाता हूँ,
फिर भी हर गम भुलाने की दवा ढुढ़ कर हर रोज लाता हूँ।
अपनाऐ थे जो रास्ते मंजिल तक पंहूचने को, न जाने वो रास्ते ही भूलता जा रहा हूँ,
हर कदम एक नई चुनौती झेल रहा हूँ,
खुश हूँ के इस काबिल हूँ जो हर चुनौती पार करता जा रहा हँ।
छोटी-छोटी खुशियों की चाह लिए बैठा हूँ,
खुशियों की किमत नहीं होती ये सुनता आ रहा हूँ,
पर फिर भी उन्हीं की किमत चुकाने के लिए कमता जा रहा हूँ

गुरू विरक की कलम से

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