छोटा सा गांव हमारा

पुरवईया की महकी हवाँ
बागो से चुराती खुशबू
लोगो की आने की
यहाँ रहता है ज़ुस्तज़ु

अमरैया से कोयल बोली
आ रही मधु ऋतू
बरगद की छाँव में
बैठे है ढोलू -गोलू

मन मोहक छटा बिखरती
चारो ओर गांव की हरियाली
हर दिन रहता है त्यौहार जैसा
गुलजार सुबह शाम गली

सोना उगलता है तभी
पालन-पोषण होता है
है मिट्ठी की खुशबू
प्रकृति की धनी है

भूमिपुत्र का गांव हमारा
सुन्दर मनोरम लगता है
देख हसदेव नदी की किनारा
छत्तीसगढ़ में है बसा
छोटा सा गांव हमारा,
खेत खलिहान हरी-भरी
सुन्दर “मोहतरा ” गांव हमारा

कवि:- दुष्यंत कुमार पटेल “चित्रांश”

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