Dec 7, 2020 · कविता
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छुईमुई मुर्झाती क्यों हो

तुझे सहेज रखने वाते, करते हैं ठिठोली तुझसे
छुईमुई मुर्झाती क्यों हो छु लेने से पल्लव को ।
अंतरंग तुम लज्जाती, जो कठोर बनो कहता तुमसे
आर्तता हृदय की तुम क्यों नहीं दर्शाती बल्लव को ।
अबला नहीं तुम शक्ति हो कहता मैं तुमको कबसे
ध्रुव विश्वास से तुम क्यों नहीं ताङती निर्लज्ज को ।
तुम हो संपूर्ण जगत की बनी, बनी सृष्टि तुमसे
अपने दिव्य आभ से क्यों नहीं डुबाती अप्लव को ।
शिव की तुम अरधांगीं, दानुज पाते भय तुमसे
उठा कटार नहीं क्यों करती नष्ट दारुण विप्लव को ।
छुईमुई मुर्झाती क्यों हो छु लेने से पल्लव को
आर्तता हृदय की तुम क्यों नहीं दर्शाती बल्लव को ।

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Devender Kumar Dahiya
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