"छिपकली दीवार की"

मकान के दूसरे मंजिल का कमरा जो बिलकुल किनारे पड़ता है ,कमरे की एक खिड़की बाहर की तरफ खुलती है | जिससे सड़क पर आने जाने वालों की सारी हलचल का पता चलता रहता है | रोज की तरह आज भी मै दोपहर के समय स्कूल से घर लौटा तो सीधे अपने कमरे में चला गया | सब कुछ सामान्य था | जैसे ही मैं आराम करने के लिए बिस्तर पर लेटा तभी मेरी नजर सामने वाली दीवार पर लगी घड़ी की तरफ़ गई | मैंने देखा एक छिपकली बड़ी शांत अवस्था में दीवार से चिपकी हुई है |वैसे तो कमरे में कई बार छिपकलियों का आना जाना रहा लेकिन हर बार वह मेरे द्वारा बाहर भगा दी गईं,पर मैंने इस बार सोंचा की प्रकृति ने जिस प्रकार हमें कहीं भी रहने,अपना घर बनाने की स्वतंत्रता प्रदान की है —-यह भी प्रकृति का ही एक प्राणी है अगर हमें कोई हमारे घर से बाहर निकाल दे तो कितनी तकलीफ होगी | यही सोंचकर मैंने आज उसे अपने कमरे में रहने दिया | वह बड़ी शांति पूर्वक अपनी जगह पर बैठकर किसी शिकार का इंतजार करने लगी ——–धीरे-धीरे शाम हो गई और मै भी अपने किसी काम से बाहर चला गया ,रात को देर से वापस आने के कारण जल्दी ही सो गया | सुबह सोकर उठा तो देखा छिपकली पूरे हक के साथ कमरे की दूसरी दीवार पर विचरण कर रही है |धीरे-धीरे समय बीतता गया और उसने दीवार पर लगी घड़ी के पीछे वाले हिस्से को अपना घर बना लिया |अब वह कहीं दूसरी दीवार पर भी नहीं जाती |वहीँ बैठकर जो भी शिकार मिल जाता उसी से अपना पेट भर लेती |मेरे द्वारा उसकी हर एक गतिविधि पर ध्यान रखते-रखते न जाने कब वह मेरे जीवन का एक हिस्सा बन गई |अब तो कमरे में दाखिल होते ही सबसे पहली नजर उसी दीवार घड़ी पर जाती जिसके पीछे वह बैठती थी |अगर कुछ पल तक वह दिखाई न दी तो मेरी आँखें बेचैनी से चारों तरफ उसे ढूँढने लगतीं|समय के साथ अब वह मेरी दोस्त बन चुकी थी |—————-एक दिन मै अपने स्कूल से वापस लौटकर जैसे ही कमरे में दाखिल हुआ ,मैंने सबसे पहले दीवार की तरफ़ देखा लेकिन आज वह मुझे दिखाई नहीं दी |मैंने सोंचा शायद कहीं शिकार की तलाश में इधर उधर भटक गई होगी सो अपने बिस्तर पर लेटकर सो गया |सुबह प्रतिदिन की दिनचर्या के हिसाब से स्कूल चला गया |जब स्कूल से वापस लौटकर आया और दीवार घडी के पास गया तो देखा छिपकली अब भी वहाँ नहीं थी |
अब तो मुझे चिंता होने लगी |सब जगह खोज लिया लेकिन वह नही मिली |मन व्याकुल हो रहा था ,ऐसा लग रहा था मानो कोई सच्चा साथी बिछुड़ गया हो |मैंने सम्भावित सभी जगह उसे खोज लिया लेकिन कुछ भी पता नहीं चला |निरास होकर मैं अपने बिस्तर पर बैठ गया |अभी उसी के बारे में ही सोंच रहा था कि मेरी नजर कमरे के दरवाजे पर पड़ी ,दरवाजे और दीवार के बीच बहुत थोड़ी सी जगह थी |मुझे कुछ दिखाई पड़ा,अनिष्ट की आशंका से मेरा मन भयभीत हो गया |दौड़कर दरवाजे के पास गया तो देखा शायद किसी शिकार की वजह से वह छिपकली दरवाजे के पास आई होगी और किसी के द्वारा दरवाजा बंद कर देने से संकरी जगह में दबकर उसकी मृत्यु हो गई |मन में एक जोर का झटका लगा एक छोटे से प्राणी के प्रति इतना लगाव आज महसूस किया |कुछ क्षण के लिए तो स्तब्ध रहा गया समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें एक छोटे से मूक प्राणी से बिछड़ने पर यह स्थिति होती है, तो न जाने किस तरह से इंसान-इंसान की हिंसा कर देता है जो कि भावनाओं का स्रोत है ——–शायद उसकी यही नियति थी लेकिन वह मेरे मन मष्तिष्क पर गहरा घाव और प्रभाव छोड़ गई |

अमित मिश्र
जवाहर नवोदय विद्यालय
नोन्ग्स्टोइन

Do you want to publish your book?

Sahityapedia's Book Publishing Package only in ₹ 9,990/-

  • Premium Quality
  • 50 Author copies
  • Sale on Amazon, Flipkart etc.
  • Monthly royalty payments

Click this link to know more- https://publish.sahityapedia.com/pricing

Whatsapp or call us at 9618066119
(Monday to Saturday, 9 AM to 9 PM)

*This is a limited time offer. GST extra.

Like 1 Comment 0
Views 55

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share
Sahityapedia Publishing